Mujhe bhi kuch kehna hai

Mann ki aawaz

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sadhana thakur


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है सच को पाना ……..

Posted On: 25 Feb, 2012  
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हो……..सुर्ख लाल II

Posted On: 11 Feb, 2012  
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वक़्त ही तो था …

Posted On: 20 Jan, 2012  
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ज़िन्दगी तुझे जी कहाँ पाई …!!!

Posted On: 7 Jan, 2012  
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मैं हूँ कौन ???????????

Posted On: 11 Dec, 2011  
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♥ ♥ ♥ जी चाहता है ♥ ♥ ♥

Posted On: 30 Oct, 2011  
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फिर आज दिल क्यूँ रोया ?

Posted On: 17 Oct, 2011  
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के द्वारा: कुमार हर्ष कुमार हर्ष

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चूँकि रिश्ता खून का था इसलिए नाखून काटा और सर धो के नहाई बस रिश्ते का क़र्ज़ उतर गया लेकिन अन्दर तक कुछ दरक सा गया | क्या हर रिश्ते की आयु सिर्फ यहीं तक है..? सालों की दूरी क्या दीमक की तरह हमारे रिश्ते नाते को चाट नहीं चुकी है..? साधना जी बहुत सुन्दर और सार्थक लेख ..मन को छू लेने वाला कैंसर से मृत्यु ...कल ही हमारे दफ्तर में पहले काम करने वाली सफाई कर्मी मधु एक बार सीढ़ियों से घर में गिरी फिर हाथ के जोड़ के पास गाँठ ..फिर उस की कैंसर से चंडीगढ़ में मृत्यु हुयी अब दो छोटे बच्चे मौसी के घर ...उसी समय आप का ये लेख .....दर्द से मन भर गया .. जिंदगानी पानी का बुलबुला है ..लोग करें भी तो क्या देखते हैं और पेट की खातिर दौड़ लगा देते हैं .... सार्थक लेख ..ढेर प्रश्न लिए काश कुछ बदले आभार भ्रमर ५

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के द्वारा: डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज" डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

कुसरत मे हर घटना, पिछली घटना की प्रतिक्रिया है, अपने आप कोइ घटना नही बनती । जमिन घुमती है ईस लिये रात दिन होते हैं । गरमी पडती है तो बारिश होती है । मिलना भी घटना है तो उस की प्रतिक्रिया भी होनी है । बिछडना पडता है । मेहमान घर मिलने आता है, अच्छा लगता है, सब को । अगर वो ज्यादा समय या दिन रूक जाता है तो प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है । पहले अच्छा लगाता था वो अब बूरा लगता है, मेहमान को जानेकी कामना ही होने लगती है । कुदरत से खिलवाड कर के मिलन को शादी-ब्याह में बांध दिया । परिणाम सामने है, हररोज प्रतिक्रियाएं होती रहती है । कुदरत के नियम को समज लिया जाए तो काफी चीजों से उठती पीडा कम हो जाती है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

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आदरणीय साधना जी, कल मेरे बेटे ने मुझ से कहा (वो फरवरी में छ साल का हो जाएगा) पापा हम सब नॉन लिविंग थिंग हैं.......!मैंने कहा नहीं बेटा हम सब लिविंग थिंग हैं...... तो उसने मुझे समझाते हुए कहा की " पापा वो हमारे पेट में भगवान् जी रहते हैं और वो जो कहते हैं वही हम करते हैं इसलिए हम नॉन लिविंग थिंग हैं, हम में से किसी को ये नहीं पता की उसके दिमाग में ये बात कहाँ से आई.......! आपकी कविता जो सत्यता बयान करते हुए बहुत से प्रश्न पूछती है शायद उसका जवाब शायद मेरे बेटे ने देने की कोशिश की है ..........! हालांकि में अभी तक उसे सही जवाब नहीं दे पाया हूँ....... क्योंकि उसकी हाँ में हाँ मिलाता हूँ तो उसके अंक कटेंगे और यदि नहीं मिलाता हूँ तो फिर अगला प्रश्न खड़ा हो जाएगा......... :)

के द्वारा: munish munish

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आदरणीया साधना जी, सादर अभिवादन !! शायद ये भी ज़िंदगी का एक रूप है.....बाकी अनेकों की तरह । जैसी भी हो जीना तो सबको ही पड़ता है....लेकिन हाँ इतना ज़रूर है कि ऐसा कुछ होने पर उस सर्व-शक्तिमान परमपिता के अस्तित्व पर कभी कभी थोड़ा शक होने लगता है । आपके इस प्रयास एवं उस बूढ़ी अम्मा को समर्पित मेरे दिल से निकले कुछ अल्फ़ाज़..... . एक मासूम परिंदे के मुक़द्दर की कहानी है, हसरतों से भरी एक छोटी सी ज़िंदगानी है ॥ कभी लगती हर चेहरे को क़रीब से जानती हुई, कभी अपनी ही क़िस्मतों से अनजानी है ॥ कभी होंगे सज़दे हर तरफ़ खुशियों के, कभी आंसुओं से भी ख़ुद की पलकें सजानी है ॥ कभी होती खड़ी किसी हठीले पत्थर की मानिंद, कभी किसी गुज़रते दरिया का बहता-सा पानी है अपना अक़्स दिखता है हर ज़र्रे में कभी, कभी दिखती दुनिया की हर शह बेग़ानी है ॥ फ़क्त चंद लम्हों की ज़द्दोज़हद-सी है, कुछ ख़ुद भी गुज़रेगी, कुछ मुझे भी बितानी है ॥ . बहुत बहुत आभार आपका !! . http://sandeepkaushik.jagranjunction.com/2011/07/18/%E0%A5%9B%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80/

के द्वारा: राही अंजान राही अंजान

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नमस्कार जी ..............इसी बहुत सी घटनाए है मुझे लग रहा है यह कोई कहानी नही अपितु यह आपके जीवन में घटित आपकी अखो से देखा हुआ है .लेकिन यह बहुत ही दुखद है और यह सब हमारे समाज की गलतियों के कर्ण ही होता है हमारा समाज किस और जा रहा है की एक महिला हो या कोई पुरूष इस हालत में हम उसकी किसी तरह की कोई भी मदद नही करते .आखिर क्या कारण है की हम केवल खुद तक और अपने परिवार तक ही सिमित रहते है ? जब वह महिला गाव -गाव जाकर बर्तन धो रही थी क्या तब गाव की पंचायत या किसी समाज सेवी का कर्तव्य नही बनता था उस्म महिला की कुछ मदद करे .या फिर गाव का कोई एक परिवार उसकी लड़की या फिर लड़के को पढ़ने का जिम्मा ले -ले . किस और जा रहा है हमारा समाज जहा सभी की एक ही सोच है खुद पैसे कमाओ बस यदि कोई दुखिया है तो उसकी मदद न करो .हम एक घटिया माहोल में जी रहे है जहा कोई इंसानियत नही है .आपके इस लेख को पढ़कर मन बहुत दुखी है

के द्वारा: vikasmehta vikasmehta

साधना जी बधाई आप ने जिस प्रकार अपने लेखन के माध्यम से नारी की वास्तविक एवं मार्मिक प्रस्तुति दी है वह सम्भवता नारी के बिभिन्न रूपों की प्रकाष्ठा है इस विषिस्ट एवं निष्पछ लेख के लिए पुनः बधाई इस लेख को पढने के बाद मै " माँ " पे लिखी मेरी रचना पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ ..... माँ ममता त्याग तपस्या और बलिदान है ! माँ जिंदगी की किताब और अनंत ज्ञान है !! माँ से सभ्यता संस्कृति और संस्कार है ! माँ से मानवता अपनत्व और संसार है !! माँ है तो बचपन है स्कूल है हाँथ में दूध की कटोरी है ! माँ है तो ममता है दुलार है निदिया की लोरी है !! माँ जीवन सवांरती है उसके असंख्य रूप होते है ! माँ जिनके साथ नहीं होती वो ममता के लिए रोते है !! जबतक बच्चे घर नहीं आते माँ को नींद नहीं आती ! माँ सीने से लगाती है थपकी देकर सुलाती है !! माँ बच्चो पर आती विपदा सहर्ष हर लेती है ! भूख गरीबी कुटिया में भी जीवन गुजार देती है !! माँ मरियम फातिमा पन्नाधाय में नजर आती है ! माँ गीता बाईबल और कुरान में नजर आती है !! इस भौतिकता की आभा में हम परछाई पकड़ने जाते है ! घर में बूढ़े माँ-बाप के लिए कुछ काम सौप के जाते है !! वो सेवा वो सत्कार कहाँ अहंकार हमारी बाड़ी है ! हम माँ की ममता भूल चुके घर-घर की यही कहानी है !! माँ के दूध का कर्ज चुकाया नहीं जा सकता ! माँ- बाप का स्थान दूसरा ले नहीं सकता !! माँ-बाप के आशीषों से लोग जिंदगी की ऊँचाईया छूलेते है ! वो लोग अज्ञानी अहंकारी है जो माँ-बाप से मुंह मोड़ लेते है !! माँ-बाप का सम्मान करो उन्हें असहनीय शब्द मत बोलो ! माँ-बाप के लिए ब्रिधा-आश्रम के नहीं अपने घर के दरवाजे खोलो !! माँ-बाप के लिए ब्रिधा-आश्रम के नहीं अपने घर के दरवाजे खोलो !!

के द्वारा: Sanowar Ali Sanowar Ali

के द्वारा: sadhana thakur sadhana thakur

के द्वारा: sadhana thakur sadhana thakur

आदरणीय साधना जी ...... सादर अभिवादन ! पता नहीं इस रचना को पढ़ते समय शुरू से ही दिल से आवाज आ रही थी की जो आप कह रही है वैसी बात है नहीं ..... और अंत में मेरा अंदेशा सच निकला की यह आपकी जीवन से किसी न किसीक रूप में कहीं गहरे से जुडी हुई ही निकली ....... आपने अपनी तरफ से अपनी इस फिल्म में सस्पेंस अंत तक कायम रखने की भरपूर कोशिश की लेकिन मेरे जैसे जागरूक दर्शक शुरू से ही इसके बारे में जान गए थे ...... ************************************************************************************************************* सच में ही औरत त्याग +ममता +दया और न जाने कितने ही अनगनित गुणों की खान है जिनका की बखान नहीं किया जा सकता ..... इस दुनिया में हरेक तरह के लोग मिलते है ..... जो इस रंगमंच पर जैसा काम कर अपनी भूमिका को निभा जाता है वैसा ही उसका यशगान और बखान होता है ..... इस सुंदर+सच्ची रचना पर अब और क्या कहू धन्यवाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरणीया साधना जी,  सादर प्रणाम औरत मां है, बहन है, बेटी है, सब कुछ है। संसार में मां न होती  तो हम न होते। इसका अहसास सभी को है। जिसे अहसास नहीं  है, वह जिन्दा रहते हुए भी मृतक समान है। मां बेटे के भलाई के  लिए न जाने क्या- क्या की परन्तु जैसे ही बेटा बड़ा होता है तो  बात-बात में कह देता है कि मां तू नहीं समझ रही है। जब बेटा  अबोध था तो उसकी हर जरूरतों को बिना बताये ही मां समझ  लेती थी और  जब बड़ा हो गया तो मां को कहता है कि तू नहीं  समझ रही है। मां पहले भी समझती थी, मां अब भी समझती है  और मां बाद में समझती रहेगी। मां का संसार में कोई विकल्प  नहीं है। औरत की पीड़ा औरत ही समझती है। अब भी अधिकांश  पुरूष औरत की पीड़ा से वंचित हैं। बचपन में पिता, सयानी होने  पर भाई, विवाहित होने पर पति और बूढ़ी होने पर बेटे के दबाव  में जीवन यापन करती है। इस सच को हमें कबूल करना चाहिए।  आखिर मां को मां महसूस करने में हमें गुरेज क्यों है। हम अपनी  मां को मां नहीं समझेंगे तो निश्चित तौर पर मेरा बेटा भी मुझे मां  या पिता न समझे तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। औरत क्या हैं ? तप…त्याग…या तपस्वनी.. से अधिक मां है। मां का प्यार  अथाह समुद्र से भी गहरा है। पृथ्वी पर प्रत्यक्ष में कोई भगवान या देवता है तो वह मां है।  

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