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मैं हूँ कौन ???????????

Posted On: 11 Dec, 2011 में

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मैं हूँ कौन ?

एक शक्ल एक जान

हाँ , मेरी है एक पहचान

फिर दिल के दरवाज़े पर ये दस्तक कैसी ?
मानो कोई कह रहा हो
अन्दर कौन ?
अन्दर कौन ?


भटकाव है ज़िन्दगी बस एक भाव है ज़िन्दगी
हम सब है मेहमान
क्यूँ भूल रहा इंसान
अरे मूरख खुद को पहचान
तू कौन ?
तू कौन ?


“स्व” में उलझी अर्थ ढूँढती स्व का
अहम् है या आन
करूँ किस किस की पहचान
भरम में उलझा ये मन
सवाल फिर वही …
मैं कौन ?
मैं कौन ?


मिटटी का है तन, बस दो गज़ कफ़न
ज़रुरत बस इतनी
फिर क्यूँ इतना गर्जन
हर तरफ है पागलपन
इंसानियत क्यूँ है आज मौन
मैं हूँ कौन ?
मैं हूँ कौन ?


ढूंढना ही है कुछ , तो खुद को ढूंढ ले
धरती का सीना क्यूँ चीरे
मन के सागर को फिर से मथ ले
कोई सच्चा मोती शायद हाथ आ जाये
ए मानव तू स्व का अर्थ समझ जाये …|||

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62 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Charchit Chittransh के द्वारा
December 25, 2011

ये प्रश्न ये अंतर्द्वंद ये ही जीवन की चुनौती ये ही आसरे इनसे ही होता प्रस्फुटित विचारों का झरना ये ही मचाते अंतस्थल में कोहराम इनमें ही मिलता मन को विश्राम उठता हुआ प्रत्येक प्रश्न यक्ष प्रश्न सा जटिल असफल ‘विक्रम’ सा, जीवन अविराम प्रयत्नशील …..

    sadhana thakur के द्वारा
    December 26, 2011

    बहुत खूब लिखा आपने ,,प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद् ………

D33P के द्वारा
December 22, 2011

मैं कौन और मेरे अन्दर कौन ?एक सवाल जिसका कोई जवाब नहीं !!!!!!!!!

    sadhana thakur के द्वारा
    December 22, 2011

    बहुत -बहुत धन्यवाद् आपका रचना को पढने के लिए ……………

roshni के द्वारा
December 22, 2011

साधना जी बहुत सुंदर रचना एक ऐसा सवाल जिसका जवाब नहीं .. आखिर कौन हूँ मै .. बहुत से रिश्तों मै divided इंसान खुद की तलाश मै अक्सर खुद से ही पूछते की मै हूँ कौन .. बहुत बढ़िया आभार

    sadhana thakur के द्वारा
    December 22, 2011

    रौशनी जी ,,,,,,,,,,,धन्यवाद् आपका की आपने कविता पढ़ी और उसे सराहा ,,,,,,,

kiranarya के द्वारा
December 20, 2011

साधना जी एक सार्थक भाव अपने आप को खोजती बेहतरीन रचना, इंसान ताउम्र आपा धापी में लीन रहता है और आखिर में दो गज जमीन में जाकर उसका सफ़र पूरा होता है…………..

    sadhana thakur के द्वारा
    December 20, 2011

    किरण जी ,बहुत -बहुत आभार आपका की आपने मेरी रचना को पढ़ा और अपनी पहली प्रतिक्रिया दी ,धन्यवाद् आपका ………….

naturecure के द्वारा
December 18, 2011

आदरणीय साधना बहन जी सादर अभिवादन ! बहुत ही सुन्दर शब्दों में जीवन के सत्य को आपने रचना में प्रस्तुत किया ………………बहुत बहुत बधाई ,आभार !

    sadhana thakur के द्वारा
    December 18, 2011

    कैलाश भाई ,बहुत आभार आपका की आपने रचना पढ़ी और प्रतिक्रिया दी ,एक कवि या लेखक के लिए इससे बढ़ी बात कुछ नहीं होता की लोग उसकी रचना को पढ़े और सराहे ,धन्यवाद् …………….

Lahar के द्वारा
December 18, 2011

प्रिय साधना जी नमस्कार स्वयं का पहचान कराती आपकी ये कविता आपकी अन्य कविताओ से अलग लगी | आपने एक अलग शैली में कविता लिखी है | कविता की हर पंक्ति भाव और अर्थ पूर्ण है | अच्छी कविता के लिए बधाई | धन्यवाद |

    sadhana thakur के द्वारा
    December 18, 2011

    लहर भाई ,आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार था ,,बहुत खुशी हुई ये जानकार की आपको कविता पसंद आई ,,दिल से आभार ………..

Rajkamal Sharma के द्वारा
December 18, 2011

आदरणीय साधना बहिन जी ….. सादर अभिवादन ! आपकी उह अति उत्तम रचना को पढ़ कर वोह गान याद आ गया है “सजन रे झूठ मत बोलो –खुदा के पास जाना है” सच में ही आपकी इस क्षेत्र में इतनी शीघ्रता से इतनी ज्यादा तरक्की देख कर बेहद खुशी और हेरानी भी होती है ….. KEEP – IT – UP Mubaarkbaad

    sadhana thakur के द्वारा
    December 18, 2011

    समानीय राजकमल भाई ,आपकी दुबारा प्रतिक्रिया पाकर हर्ष के साथ आश्चर्य भी हुआ ,,कुछ भूल हो गई हो तो ……………..

mparveen के द्वारा
December 18, 2011

साधना जी नमस्कार , ढूंढना ही है कुछ , तो खुद को ढूंढ ले धरती का सीना क्यूँ चीरे मन के सागर को फिर से मथ ले कोई सच्चा मोती शायद हाथ आ जाये ए मानव तू स्व का अर्थ समझ जाये …||| बिलकुल सही कहा अपने अगर कुछ खोजना ही है तो खुद की पहचान खोज ….

    sadhana thakur के द्वारा
    December 18, 2011

    परवीन जी ,,बहुत -बहुत आभार की आपने कविता पढ़ी और विचार दिए ,,धन्यवाद ……..

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
December 15, 2011

आदरणीया साधना जी ..जय श्री राधे …अति सुन्दर … आप ने तो पूरा दर्शन शास्त्र ही दिखा दिया अब भी इस जीवन को लोग न समझें ,न जाने …पागलपन दिमाग पर चढ़ा रहे इंसान का मस्तिष्क सो जाए तो क्या कहा जाए … सुन्दर ..शिक्षाप्रद हर पंक्ति और मूल भाव कोमल … .भ्रमर ५

    sadhana thakur के द्वारा
    December 15, 2011

    भ्रमर जी ,धन्यवाद ,,,आपके अति उत्तम विचार के लिए ………

Santosh Kumar के द्वारा
December 15, 2011

आदरणीय साधना बहन ,.सादर अभिवादन मैं क्या तारीफ करू ?….बहुत ही अच्छी ,.जैसाकि गुरुदेव ने कहा …आध्यात्मिकता का पुट लिए हुए आत्मचिंतन कराती रचना ,…..हार्दिक साधुवाद

    sadhana thakur के द्वारा
    December 15, 2011

    संतोष भाई ,बहुत -बहुत धन्यवाद् ,,मुझे लगा आप नाराज हैं ,,पर आपकी प्रतिक्रिया पाकर बेहद ख़ुशी हुई …………

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    December 15, 2011

    संतोष जी नाराज होना होगा तो हम हैं न /// ह हा …. यहाँ तो इस निम्न से रूबरू होने के बाद ….विचार वस् …………भ्रमर ५ मिटटी का है तन, बस दो गज़ कफ़न ज़रुरत बस इतनी फिर क्यूँ इतना गर्जन हर तरफ है पागलपन इंसानियत क्यूँ है आज मौन मैं हूँ कौन ? मैं हूँ कौन ?

    sadhana thakur के द्वारा
    December 16, 2011

    भ्रमर जी ,मंच पर हम सब का एक स्वस्थ रिश्ता बन चुका है ,,,,,,,,

munish के द्वारा
December 13, 2011

आदरणीय साधना जी, कल मेरे बेटे ने मुझ से कहा (वो फरवरी में छ साल का हो जाएगा) पापा हम सब नॉन लिविंग थिंग हैं…….!मैंने कहा नहीं बेटा हम सब लिविंग थिंग हैं…… तो उसने मुझे समझाते हुए कहा की ” पापा वो हमारे पेट में भगवान् जी रहते हैं और वो जो कहते हैं वही हम करते हैं इसलिए हम नॉन लिविंग थिंग हैं, हम में से किसी को ये नहीं पता की उसके दिमाग में ये बात कहाँ से आई…….! आपकी कविता जो सत्यता बयान करते हुए बहुत से प्रश्न पूछती है शायद उसका जवाब शायद मेरे बेटे ने देने की कोशिश की है ……….! हालांकि में अभी तक उसे सही जवाब नहीं दे पाया हूँ……. क्योंकि उसकी हाँ में हाँ मिलाता हूँ तो उसके अंक कटेंगे और यदि नहीं मिलाता हूँ तो फिर अगला प्रश्न खड़ा हो जाएगा……… :)

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    सही कहा मुनीश भाई ,,आज कही न कही ,कभी न कभी अपने मृत होने का एहसास तो जरूर होता है जब हम खुद को विवश पाते है ………….आभार …………………..प्रतिक्रिया के लिए ………

    jlsingh के द्वारा
    December 19, 2011

    मुनीश बाबु, नमस्कार! आपका बेटा लगभग ६ साल का! सवाल ऐसा की साथ साल का आदमी भे सोचने लग जाय! आखिर बेटा किसका है? सचमुच आजकल के छोटे बच्चे के सवाल से हमलोग कतराने लगते हैं क्योंकि हम स्वयम अभी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाए है वसे में साधना बहन का यह प्रश्ने हम हैं कौन? बिलकुल वाजिब सवाल है जिसका उत्तर उन्होंने अपने अंतिम पैरा में देने की कोशिश की है. साधना बहन को साधुवाद और आपको भी!

    sadhana thakur के द्वारा
    December 20, 2011

    jl सिंह भाई बहुत बहुत आभार आपका की आपने रचना को पढ़ा और सराहा ||

akraktale के द्वारा
December 13, 2011

साधना जी सादर नमस्कार, बहुत ही सुन्दर आत्मचिंतन को मजबूर करती रचना.जिस सांचे में ढल जाएँ उसी के हो जाते हैं और हम खुद को ही भूल जाते हैं.

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    सर ,आभार आपका प्रतिक्रिया हेतु …………..

RaJ के द्वारा
December 13, 2011

दुनिया से कोंनेक्ट खुद से बेखबर इस इंसान की सुन्दर प्रस्तुति साधना जी बधाई http://www.jrajeev.jagranjunction.com

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    सम्मानीय राज जी ,,आभार आपका की आपने कविता पढ़ी और अपने विचार दिए …………..

Amar Singh के द्वारा
December 12, 2011

बहुत से प्रशन, कुछ उत्तर, कुछ अनुत्तर, गहन शुन्य, अंतिम सत्य. बहुत सुदर शब्द रचना, बधाई. http://singh.jagranjunction.com

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    अमर जी ,बहुत -बहुत धन्यवाद् ,,आपकी प्रतिक्रिया के लिए ……….

alkargupta1 के द्वारा
December 12, 2011

प्रिय साधना , अनुत्तरित प्रश्न के उत्तर के लिए अंतर्भावों का मंथन करती अति उत्तम रचना……शुभकामनाएं

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    भाभी जी ,प्रणाम ………..बहुत दिन बाद कुछ लिखने का अवसर मिला …आपको कविता अच्छी लगी ,आभार आपका …आपका प्यार और आशीर्वाद बना रहे ………….

manoranjanthakur के द्वारा
December 12, 2011

बहुत ही सार्थक रचना बहुत बधाई

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    दिल से आभार आपका ……………मनोरंजन जी ………..

Rajkamal Sharma के द्वारा
December 12, 2011

आदरणीय साधना बहिन जी ….. आदाब ! आध्यात्मिकता का पुट लिए हुए बहुत ही प्रेरणादाई रचना सच में ही मन करने लगा है कि ब्लागिंग को छोड़ कर आपके दिखाए और सुझाए मार्ग का अनुसरण करूँ ताली बजाकर बधाई नहीं नहीं मुबारकबाद हा हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    सम्मानीय राजकमल भाई ,,दिल से आभार आपका ……….अपना आशीर्वाद बनाये रखें ………..

Amita Srivastava के द्वारा
December 12, 2011

साधना जी नमस्कार मैं हूँ कौन , कभी स्व को समझकर भी अनजान भटकता रहता है मनुष्य . अच्छी लगी रचना

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    नमस्कार अमिता जी ,,बहुत ख़ुशी हुई आपकी प्रतिक्रिया को पाकर ..आभार आपका …………

sumandubey के द्वारा
December 12, 2011

साधना जी नमस्कार , बहुत सुन्दर कविता खुद को जानना ही तो सबका कठिन है .

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    धन्यवाद् सुमन जी ….अच्छा लगा जानकर की आपको रचना पसंद आई …………..

shashibhushan1959 के द्वारा
December 12, 2011

आदरणीय साधना जी, सादर. मन - जलधि को मथकर संतोष रुपी मोती को प्राप्त करने की प्रेरणा देती एक सुन्दर धीर-गंभीर रचना के लिए बधाई !

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    बहुत- बहुत धन्यवाद् शशिभूषण जी ……….

allrounder के द्वारा
December 12, 2011

साधना जी नमस्कार, मानव के अंतर्भावों को व्यक्त करती बेहद सार्थक रचना पर आपको बधाई !

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    नमस्कार आपको …आभार आपका …………..

Abdul Rashid के द्वारा
December 12, 2011

आदरणीय साधना जी नमस्कार ढूंढना ही है कुछ , तो खुद को ढूंढ ले अस्तित्व का दर्पण कराती सुंदर रचना http://singrauli.jagranjunction.com/2011/12/11/मकई का दाना/

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    अब्दुल bhai ,bahut आभार आपका आपकी प्रतिक्रिया के लिए ……………..

Rajesh Dubey के द्वारा
December 12, 2011

जिन्दगी में हम सब एक पथिक की तरह है. लेकिन लगता है कि पुरे धरती को ही पा लेना है. और मौत के बाद सब यही रह जाता है. बहुत भाव पूर्ण कविता, बधाई.

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    राजेश जी ,,,,,,,आभार आपका आपकी प्रतिक्रिया के लिए ………

abodhbaalak के द्वारा
December 12, 2011

आत्म मंथन करती रचना संध्या जी काश हम खुद में झाँक सकते ………. सुन्दर, सदा की भांति http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    अबोध जी ,,आपके विचार के लिए आभार आपका ,,लगता है आप कविता में इतना खो गए की मेरा नाम ही भूल गए …………..

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    टाइपिंग मिस्ताके के लिए क्षमा, :(

sukanyathakur के द्वारा
December 12, 2011

mom a good poem to think about…i lyk it..:) :)

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    thanks beta ,thanks a lot ……………

minujha के द्वारा
December 11, 2011

एक मनुष्य को उसके अदने से अस्तित्व का दर्पण दिखाती एक यथार्थवादी रचना,बहुत सुंदर

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    मीनू ,बहुत ख़ुशी हुई जानकार की तुम्हे कविता अच्छी लगी ………धन्यवाद् …………….

nishamittal के द्वारा
December 11, 2011

साधना जी बी आहूत गहन विचारों से युक्त रचना.बधाई अंतिम पंक्तियाँ बहुत पसंद आयीं .ढूंढना ही है कुछ , तो खुद को ढूंढ ले धरती का सीना क्यूँ चीरे मन के सागर को फिर से मथ ले कोई सच्चा मोती शायद हाथ आ जाये ए मानव तू स्व का अर्थ समझ जाये …||| Rate this Article:

    dineshaastik के द्वारा
    December 13, 2011

    आदरणीय साधना जी, प्रणाम। आपकी यथार्थवादी एवं मन मंथन करने वाली रचना पढ़कर कुछ पल के लिये तो मैं अपने आपको भूल गया। यक्ष प्रश्न खड़ा करने वाली रचना की बधाई।

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    आदरणीय निशा जी ,,,,,,,,,,,,,,तहे दिल से शुक्रिया आपका ……………रचना की प्रसंशा के लिए ………….

    sadhana thakur के द्वारा
    December 13, 2011

    दिनेश जी ,बहुत -बहुत आभार आपका ………….आपको पहली प्रतिक्रिया के लिए ……….


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