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......लो अब बसंत आया है iii

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Maa-Saraswati-Wallpaper-51[1]एक बहुत छोटी सी कथा .बचपन से मानसपटल पर यूँ अंकित है जैसे वक़्त की दीवार पर कोई तस्वीर सदियों से जड़ी हो ,बिना अपना रंग और रूप खोये …….
मेरे दादा के पिता ,यानी मेरे परदादा .
थे तो एक आम इन्सान लेकिन महादानी ,महान संत प्रवृति के व्यक्ति थे ,भविष्यद्रष्टा थे .लगभग सौ साल हो चुके हैं इस बात को ,,,घर में दरिद्रता पाँव पसारे ऐसे जमीं थी मानो धरती पर फिर से एक बार सत्यहरीशचंद्र की परीक्षा हेतु स्वयं देव पधारे हों ,,,
वक़्त कितना भी बुरा हो मौसम ने बदलना कभी छोड़ा है ?अपने नियत समय पर उस वर्ष भी बसंत आया और अपने दामन में श्वेत धवल वस्त्र धारनी, हंसवाहिनी माँ सरस्स्वती को समेटे बसंत पंचमी का त्यौहार भी लाया ..गांव में पूजा समारोह की प्रथा और चंदा मांगने की प्रथा तब भी थी ,उस वर्ष भी मेरे परदादा के घर कुछ स्कूल के बच्चे चंदा मांगने आये,घर में एक पैसा न था ,,,,,,,बस चावल कुछ पड़ा था जो उस दिन के भोजन का आसरा था ,घर में तीन चार प्राणी का आहार था वो ,,मेरी दादी गर्भवती थी ,पर मेरे परदादा जी ने बच्चों को रोका ,घर के पिछवाड़े से दुकान गए ,चावल बेचा ,और एक चवन्नी लाकर बच्चों के हाथ में थमा दी ……
पूरा दिन सब भूखे रहे ,दादी का बस एक सवाल था ?इस घर में पढ़ने वाला कौन है ?दादाजी ने कहा ,देखना इस घर की देहरी पर इतने पढ़ने वाले विद्वान होंगे की समाज और दुनिया देखेगी ,,,,,,,,,,,सालों बीत गए ……तब का दिन और आज का दिन मेरे उस घर में भी सरस्वती की पूजा आने वाले पीढ़ी ने शुरू की जो सालों से चली आ रही है,,,,,कितने ही विघ्न आये परमेरे मायके से सरस्वती का आसन नहीं उठा .और न ही मेरे परदादा का वो विश्वास रुपी शिला ढला की इस घर में जो भी पढ़ेगा वो सफल होगा ….पूरा समाज इस हकीकत को जनता भी है और मानता भी है …
मैंने बचपन से इस कहानी को अपने बुजुर्गों के मुहं से सुना है और बचपन से सरस्वती की पूजा की है ,,,,शिक्षा का एक अनोखा रूप मैंने देखा है जहाँ , किताबी ज्ञान का महत्वा तो देखा ही है लेकिन जो मूल भूत, मौलिक शिक्षा, जीवन की गहराइयों से जुड़ी शिक्षा मैंने देखी, सीखी है, उस ईमारत में पलने वाले हर शख्स ने सीखी है….वो थी परोपकार की भावना, इंसानियत की भावना .
किन्तु हैरत होती है आज की शिक्षा का व्यवसायीकरण होते देख.. (जहाँ शिक्षित होने का अर्थ है सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना ). कभी सुना था सरस्वती और लक्ष्मी एक साथ नहीं टिकती वैसे जिसके पास सरस्वती है वो कभी भूखा भी नहीं रहता लेकिन आज सब कुछ बदल गया है … हर बसंत के साथ फूलों के रंग और खुशबू जैसे बनावटी हो गए हैं…. हर मान्यता के मायने बदल गए है …. आज समाज का रीढ़ कहलाने वाला वकील का झूठ ही उसका सच है, टीचर के लिए पैसा कमाना ही उसका ईमान है ,,डॉक्टर के लिए अपना वेतन भत्ता बढाने के लिए
हड़ताल करना और मरीजों की परवाह नहीं करना ही उनका धर्म है ,आज स्व सबसे अहंम है ,,,जब ये सब बुद्धिजीवी वर्ग पैसे के पीछे भाग रहे है ,तो फिर नेता और अभिनेता का क्या कहना ,,?वो तो शुरू से ही लक्ष्मी के पुजारी हैं .और जहाँ लक्ष्मी वहां भोग और विलासिता का तांडव तो होना लाजमी है ,,,,
आज स्कूल जाने वाले बच्चे ,सिगरेट शराब और एम् एम् एस की दुनिया में जीते हैं ,,,,कहने को ऊँची -ऊँची बिल्डिंग में बड़े -बड़े नाम के साथ विदद्या का मंदिर यानि स्कूल खोला जा रहा है मगर वास्तविक ज्ञान कहाँ है ,,?हाँ बसंत आज भी आता है ,बसंत पंचमी की पूजा भी होती है ,मगर असली स्वरुप क्या है ?चन्दा के नाम परजबरदस्ती वसूली ,,बस मूर्ती पूजा ,पूजा समारोह में फ़िल्मी गाने और अश्लील नृत्य ,,,,,,मानसिक कुंठा की पराकाष्ठा है ये ,,अशिक्षा की चरम सीमा है ये …..
लेकिन कहते हैं न मनुष्य को आशा का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए ,,,,आज भी समाज में ऐसे कई विद्वान हैं जिनसे मेरा निवेदन है कृप्या थाम लीजिये ज्ञान के विलुप्त होते बागडोर को और बचा लीजिये उन नौनिहालों को जिनको सही शिक्षा की जरूरत है ,,ताकि आने वाले बसंत में फिर एक बार असली सुगंध के वास्तविक फूल बगिया में खिल सके और हम गर्व से कह सकें……लो अब बसंत आया है ….
साधना ठाकुर.

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62 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

merehisaabse के द्वारा
February 26, 2012

बसंत नाम से जैसे ही कोई लेख दीखता है तो जरूर पढता हूँ. शायद नाम का कोई सार्थक अर्थ मिल जाये. आज शिक्षा केवल परसेंटेज या ग्रेड होकर रह गयी है. बच्चे तो स्कूल, कोचिंग क्लास, होम्वोर्क और कार्टून की कैद हो कर रह गए है. बाकि जो बचे उनका जिक्र आपने कर ही दिया है. सरस्वती माता की पूजा करवा कर कौन अपने को भाज्पावाला कहलाना पसंद करेगा, क्योंकि भाजपा भी तो केवल ऊपर से भजती है.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 26, 2012

    धन्यवाद् आपका रचना पढने के लिए …….

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 11, 2012

साधना जी,प्रणाम आपसे सहयोग की अपेक्षा है, कृपया मेरे पोस्ट को पढ़ें ये हम सब के लिए है

    sadhana thakur के द्वारा
    February 11, 2012

    आनंद जी ,जरूर पढूंगी ,,,

अलीन के द्वारा
February 11, 2012

साधना जी, सादर नमस्कार! “शिक्षा का एक अनोखा रूप मैंने देखा है जहाँ , किताबी ज्ञान का महत्वा तो देखा ही है लेकिन जो मूल भूत, मौलिक शिक्षा, जीवन की गहराइयों से जुड़ी शिक्षा मैंने देखी, सीखी है, उस ईमारत में पलने वाले हर शख्स ने सीखी है….वो थी परोपकार की भावना, इंसानियत की भावना…” शिक्षा के मूलभूत उद्देश्यों को दर्शाता हुआ गद्यांश. जो कहीं शिक्षा के व्यवसायीकरण में पीछे छुटता जा रहा है……सार्थक गद्यांश, बधाई हो!

    sadhana thakur के द्वारा
    February 11, 2012

    अलीन जी ,आपकी पहली प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार ……….

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
February 10, 2012

कितने ही विघ्न आये परमेरे मायके से सरस्वती का आसन नहीं उठा .और न ही मेरे परदादा का वो विश्वास रुपी शिला ढला की इस घर में जो भी पढ़ेगा वो सफल होगा ….पूरा समाज इस हकीकत को जनता भी है और मानता भी है … गुरु साधना जी बहुत सुन्दर सन्देश देता लेख आप का सब के घर में जबान में मन में माँ सरस्वती वास करें और हमारा देश विश्व गुरु बन परचम फहराए …श्रद्धा और मेहनत बहुत काम की चीज है …कृप्या थाम लीजिये ज्ञान के विलुप्त होते बागडोर को और बचा लीजिये उन नौनिहालों को जिनको सही शिक्षा की जरूरत है ,,ताकि आने वाले बसंत में फिर एक बार असली सुगंध के वास्तविक फूल बगिया में खिल सके.. अति सुंदर भ्रमर ५

    sadhana thakur के द्वारा
    February 10, 2012

    भ्रमर भाई .देर से ही सही आपकी बहुत अच्छी प्रतिक्रिया पाकर बहुत ख़ुशी हुई ,दिल से आभार आपका ………

alkargupta1 के द्वारा
February 10, 2012

प्रिय साधना , तुम्हारी रचना आज अभी अभी सामने देख कर पढ़ी…… बस इतना ही कहूँगी उत्कृष्ट ,प्रेरणादायक व अति प्रशंसनीय प्रस्तुति….. हार्दिक शुभकामनाएं !

    sadhana thakur के द्वारा
    February 10, 2012

    भाभी जी ,प्रणाम ,बहुत-बहुत धन्यवाद् आपका ….आपकी प्रशंसा से सदा बहुत हिम्मत मिलता है ..

कुमार हर्ष के द्वारा
February 6, 2012

kafi accha lika hay aap ne… http://kumarharsh.jagranjunction.com/ @sadhana Ji ise bhi padhe वोट की उम्मीद (कविता) (उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव) http://kumarharsh.jagranjunction.com/2012/02/06/%e0%a4%b5%e0%a5%8b%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%89%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b0/

    sadhana thakur के द्वारा
    February 6, 2012

    आभर आपका हर्ष जी ……….

drmalayjha के द्वारा
February 6, 2012

मैंने अपने स्कूल में सरस्वती पूजा की परंपरा शुरू कर दी है. मेरा उनका रिश्ता कुछ विशेष है साधना.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 6, 2012

    बहुत अच्छा किया ,हम सब का रिश्ता तो सालों पुराना है …….

February 2, 2012

क्या आप विश्वास करेंगी, मेरे रोंगटे खड़े हो गए आपके परदादा जी के महान कृत्य को पढ़कर! ऐसी विभूतियों को प्रणाम, जिनके नाम के साथ आज भी सशक्त प्रेरणा खड़ी है. सादर.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 3, 2012

    टिम्सी जी ,मैंने उनकी महानता के कई किस्से सुने हैं ,वो सच में महान थे ,,,आभार आपका ……..

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
February 2, 2012

सुन्दर आलेख.बधाई !! साधना जी.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    राजीव जी ,नमस्कार .बहुत आभार आपका प्रतिक्रिया के लिए …….

suhana के द्वारा
February 2, 2012

आपके विचार से मैं पूरी तरह सहमत हूँ .. बहुत अच्छा लेख …

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    बहुत -बहुत धन्यवाद् आपका ……

    sukanyathakur के द्वारा
    February 2, 2012

    haan main bhi bilkul sehmat hun…!!!! :) well written…!!

    sadhana thakur के द्वारा
    February 3, 2012

    thankhs beta ,love u ………..

Amita Srivastava के द्वारा
February 1, 2012

साधना जी काश वो दिन आये हमारे देश मे जब बसंत के असली सुगंध वाले फूल खिले | उत्तम रचना मंच पर रखने का हार्दिक आभार

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    अमिता जी ,नमस्कार ,आपका आभार आपकी प्रतिक्रिया के लिए ………….

jlsingh के द्वारा
February 1, 2012

साधना जी, नमस्कार! पहले तो क्षमा चाहूँगा आपके ब्लॉग पर देर से आने के लिए! आज मैंने पूरा आलेख पढ़ा और मार्मिकता को समझने का प्रयास किया…… पता नहीं कितना समझ पाया पर आस्था की ज्योति जो आपने जगाई है निश्चय ही प्रेरक है! माँ शारदे को मेरा नमन और वही आशीर्वाद की कामना करता हूँ कि हम पुन: अपनी पुरानी आस्था और विश्वास की दहलीज पर आ जाएँ. सरस्वती और लक्ष्मी में सामंजस्य पूर्ण प्रेम का प्रवाह हो और हम सब माँ भारती के सपूत गर्व से अपनी संस्कृति पर नाज कर सकें, आपके परदादा को मेरा भी नमन! साभार!

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    jlsingh,ji namaskar ,,,,दिल से आभार आपका ,आपकी प्रतिक्रिया के लिए ………

February 1, 2012

साधना जी नमस्कार ! बहुत ही रोचक, भावुक और ज्ञानपरक प्रस्तुति के लिए आपको बधाई। माँ सरस्वती आपको भी बसंत ऋतु के आगमन पर ढेरों सारी खुशियाँ प्रदान करें !!

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    सूरज जी ,नमस्कार ,बहुत -बहुत धन्यवाद् आपका की आपको रचना पसंद आई ………..

dineshaastik के द्वारा
February 1, 2012

बहुत ही प्रेरणा दायक एवं सराहनीय आलेख…… इस आलेख के लिये आपकी सेवा में  एक दोहा प्रस्तुत है- रोजी रोटी तो  मिले, मिले  न  नैतिक  ज्ञान। कितना ही वह पढ़ा हो, उसे अशिक्षित मान।।

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    बहुत सही लिखा आपने दिनेश जी ,हमेशा सीखने की भावना ही इन्सान को बेहतर बनती है ..प्रतिक्रिया के लिए आभार ……….

Rajesh Dubey के द्वारा
February 1, 2012

सरस्वती पूजा का आज जो रूप दीखता है, वह बहुत विकृत है. आवारा लड़के शराब के नशे में जो गीत की धुन बजाते है, उससे तो देवी सरस्वती तो रूठ ही जाएगी. वो लग्न, श्रधा का रूप, बस याद करने वाली रह गयी है.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    राजेश जी ,यही देख कर तो दुःख होता है ……..प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्……

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 31, 2012

,,बस चावल कुछ पड़ा था जो उस दिन के भोजन का आसरा था ,घर में तीन चार प्राणी का आहार था वो ,,मेरी दादी गर्भवती थी ,पर मेरे परदादा जी ने बच्चों को रोका ,घर के पिछवाड़े से दुकान गए ,चावल बेचा ,और एक चवन्नी लाकर बच्चों के हाथ में थमा दी … आदरणीया साधना जी, सादर अभिवादन. बधाई.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    धन्यवाद् सर ….आभार आपका प्रतिक्रिया के लिए …..

sumandubey के द्वारा
January 31, 2012

साधना जी नमस्कार , वसंत आगमन की छाया में आपकी चिता जायज है पर आज की पढाई लिखाई का यही हाल है .

    sumandubey के द्वारा
    January 31, 2012

    माफ कीजियेगा चिंता की जगह चिता चाप गया है सभी उसे चिंता पढ़े .

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    आज की शिक्षा में सुधार की कोशिश ही तो करनीहै सुमन जी ,,आभार प्रतिक्रिया हेतु ……….

    sadhana thakur के द्वारा
    February 17, 2012

    मैं समझ गई थी सुमन जी ….

minujha के द्वारा
January 31, 2012

अभी अभी वहां से होकर आई हुं, लगता है कितना कुछ बदल गया,नए लोग,नए तरीके लेकिन आज भी माता सरस्वती के आगे खङे होते ही होंठ यही बुदबुदा उठे-                  वीणापाणि पुस्तकहस्ते,भगवती भारती देवी नमस्ते इतना अच्छा संदेशपरक आलेख स्पष्ट रुप से आप पर उनकी असीम कृपा दर्शा रहा है,माता हमेशा आपके साथ रहें ये दुआ है.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    हाँ मीनू बदल तो सब कुछ गया ,लेकिन पूजा की परम्परा को मंझले भैया ने आज तक संभल कर रखा है ……..माँ सरस्वती की कृपा हम सब पर बनी रहें ………..

ANAND PRAVIN के द्वारा
January 31, 2012

साधना जी, मनमोहक मौसम की मनमोहक आवाज़ सुनाई पड़ी आपकी लेख में धन्यवाद

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    आनंद जी ,नमस्कार ,बहुत -बहुत धन्यवाद् आपका ,आपको लेख पसंद आया ……

manoranjanthakur के द्वारा
January 31, 2012

बसंत आता ही है नव जीवन का संचार करने बहुत सार्थक सुंदर रचना

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    मनोरंजन जी ,धन्यवाद् सहयोग और सराहना के लिए ………

allrounder के द्वारा
January 31, 2012

नमस्कार साधना जी, सुविचारों से सुसज्जित आधुनिकता और आधुनिक शिक्षा के उद्देश्य पर कई सवाल खड़े करते आलेख पर हार्दिक बधाई आपको !

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    सचिन जी ,बहुत ख़ुशी ये जान कर की आपको लेख पसंद आया ……..

Rachna Varma के द्वारा
January 31, 2012

साधना जी , नमस्कार आज तो सभी कुछ व्यवसायिक हो चुका है मगर कहानी बहुत अच्छी है माँ सरस्वती की कृपा आप पर तथा आपके परिवार पर बनी रहे धन्यवाद |

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    रचना जी सबसे पहले आपको धन्यवाद् आपको आपकी पहली प्रतिक्रिया के लिए ,आगे बेहद ख़ुशी हुई की आपको लेख पसंद आया ……….आभार …….

mparveen के द्वारा
January 31, 2012

साधना जी नमस्कार, बहुत ही दुःख की बात है कि आज कल पढ़े लिखे ज्यादा हैं लेकिन वो ईमान कही खो गया है . आज स्वार्थ अहम् हो गया है . आज मनुष्य हर क्षेत्र में उन्नति कि तरफ बढ़ रहा है लेकिन लेकिन कहीं न कहीं ईमान का पतन भी हो रहा है . बहुत बढ़िया शिक्षाप्रद आलेख बधाई स्वीकार करें ….

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    परवीन जी ,नमस्कार ,बहुत-बहुत धन्यवाद् आपका …….

abodhbaalak के द्वारा
January 31, 2012

साधना जी आपने सच ही कह है की शिक्षा का व्यवसैकरण जिस तरह से हुआ है उससे ………… बड़े ही सुन्दर उदहारण के साथ ( कहानी) आपने अपने इस रचना … ऐसे ही

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    अबोध भाई ,नमस्कार ..आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार आपका ………….

vinitashukla के द्वारा
January 31, 2012

बहुत ही मार्मिक प्रसंग के साथ, वसंत पंचमी के सही अर्थ की व्याख्या की है आपने अपने इस लेख में. हार्दिक बधाई और साधुवाद.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    विनीता जी ,नमस्कार ,बहुत ख़ुशी हुई जानकार की आपको रचना पसंद आई …………

akraktale के द्वारा
January 31, 2012

साधना जी सादर नमस्कार, आपके आलेख ने भाव विभोर कर दिया.जैसे सारा आलेख चलचित्र की भाँती आँखों के सामने से गुजर रहा था.आपकी सोच और लेखनी को शत शत नमन.कुछ अंश जो दिल को छू जाते हैं. “दादाजी ने कहा ,देखना इस घर की देहरी पर इतने पढ़ने वाले विद्वान होंगे की समाज और दुनिया देखेगी ,,,,,,,,,,,” “जिसके पास सरस्वती है वो कभी भूखा भी नहीं रहता लेकिन आज सब कुछ बदल गया है … ” “ताकि आने वाले बसंत में फिर एक बार असली सुगंध के वास्तविक फूल बगिया में खिल सके और हम गर्व से कह सकें……लो अब बसंत आया है ….”

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    अशोक भाई ,दिल से आभार आपका की आपको रचना पसंद आई .सहयोग बनाये रखें ……….

nishamittal के द्वारा
January 31, 2012

समाज में नैतिक मूल्यों के पतन पर बहुत अच्छी भावाभिव्यक्ति साधना जी.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    आदरणीय निशा जी ,आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए आभार आपका ..आशीर्वाद बनाये रखें …….

Sumit के द्वारा
January 30, 2012
    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    आपको भी शुभकामनाये सुमित जी ,,,,,,,,,

sinsera के द्वारा
January 30, 2012

साधना जी, नमस्कार, समाज के दिनोदिन गिरते हुए मानदंड का बड़ा ही वास्तविक चित्र अपने खींचा है जो साथ साथ चिंता जनक भी है.कमी शायद हमारी ही है जो हम बच्चो से कहते हैं कि पढो गे नहीं तो नौकरी कैसे मिलेगी.शिक्षा को केवल अच्छी नौकरी का जरिया मान लेना ही ठीक नहीं है इन्सान को इंसानियत सिखाने वाले लोग शायद अब रह ही नहीं गए . मैं आशा का दामन छोड़ने वालों में से नहीं हूँ. आने वाले वसंत में विद्या के फूल सुगन्धित हों , इस कोशिश में मैं आप के साथ हूँ.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 2, 2012

    सरिता जी आपका दिल से शुक्रिया की आप मेरे साथ हैं ,प्रतिक्रिया के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद् सहयोग बनाये रखें ………


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