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है सच को पाना ……..

Posted On 25 Feb, 2012 Others, मेट्रो लाइफ में

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आह ,सीने को चीर कर
एक हुंकार सी उठी है …..
मानव देख तेरी ज़िन्दगी
किस क़दर लुटी है ……..

जब -जब किया तूने खून
इंसानी ज़ज्बातों का ……
आसमां भी है थर्राया .
ज़मीं काँप उठी है …….
आह सीने को चीरकर
एक हुंकार सी उठी है ….

रौंदा जब -जब सीना धरती का
सागर के लहरों में उफ़ान उठी है
क़ायनात को मिटाने वाले
अस्तित्वा तेरी ख़ुद आन मिटी है
आह ,सीने को चीरकर …….
एक हुंकार सी उठी है ……….

उसूलों ,आदर्शों के लहूँ के छींटे
बिखेरे दरों -दीवारों पे ………..
छल-कपट बेईमानी का
ज़हर घोला ,फ़िजाओं में ……..
ख़ुद को ख़ुदा समझने वाले
ये तेरी नासमझी है ………..
मत भूल तूं सिर्फ मिट्टी है
तूं सिर्फ मिट्टी है ………..
आह ,सीने को चीरकर
एक हुँकार सी उठी है ……..

बदलेंगे हम ,वक़्त भी बदलेगा
अँधेरे का पट खोल ….
घर -घर में नई सोच
जाग उठी है …………
तहस -नहस हो चुकी जिंदगी में
पुरुषत्व फिर से आन उठी है ..
आह ,सीने को चीरकर
एक हुँकार सी उठी है ………

इन्तहां हो चुकी अब
छलक चुका है ,सब्र का पैमाना
शंखनाद हो चुका है ,गद्दारों ..
अब हमें है ,सच को पाना …….
अब हमें है सच को पाना ………
साधना ठाकुर

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61 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aman kumar के द्वारा
March 11, 2013

अँधेरे का पट खोल …. घर -घर में नई सोच जाग उठी है ………… तहस -नहस हो चुकी जिंदगी में पुरुषत्व फिर से आन उठी है .| अब पुरुस तत्व नही नारितत्व मे पुरुष तत्व से अधिक बल है | पर जिसपर सायद नारियो को भी विस्वास नही रहा | अब दुर्गा चंडी माँ काली बाले तत्व की आन आनी चाये | सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। दुष्यंत कुमार “

Sushma Gupta के द्वारा
February 23, 2013

आदरणीय साधना जी, आपके ब्लॉग पर प्रथम बार ही आकर इतनी सुन्दर , जोशपूर्ण क्रान्ति का बिगुल फूंकती रचना पढने को मिली इस हेतु बहुत आभार . [संपर्क बनाए रखियेगा ,ब्लॉग पर आपका स्वागत है...]

jlsingh के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीया साधना जी, एक बार होली के हुडदंग में भी पधार कर जागरण नगर को पवित्र करें!

    sadhana thakur के द्वारा
    March 9, 2012

    जवाहर भाई ,मैं ४-५ दिन से कॉमेंट्स पोस्ट कर रही हूँ मगर वो जा ही नहीं रहा है ,मैं खुद परेशान हूँ …….सारे ब्लॉग का यही हाल है .पता नहीं ऐसा क्यों हो रहा है ?

dineshaastik के द्वारा
March 5, 2012

आदरणीया साधना जी सादर नमस्कार, बेहतरीन हृदय को आन्दोलित करने वाली रचना के लिये बधाई के साथ साथ  होली के रंगीन पर्व पर सपरिवार हार्दिक शुभकामनायें। कृपया इसे पढ़कर समालोचनात्मक प्रतिक्रिया रूपी आशीर्वाद आवश्य दें…. http://dineshaastik.jagranjunction.com/?p=60&preview=trueक्या ईश्वर है (कुछ सवाल)

    sadhana thakur के द्वारा
    March 5, 2012

    दिनेश जी ,आपको भी होली की ढेर सी शुभकामनाये ,और प्रतिक्रिया के लिए आभार ….

March 2, 2012

साधना जी नमस्कार ! इतनी सुंदर रचना पढ़ने से वंचित रह गया था …क्यूंकी किहीं कारणों से एक हफ्ते के लिए बाहर चला गया था। बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ हैं इस रचना की …\ जब -जब किया तूने खून इंसानी ज़ज्बातों का …… आसमां भी है थर्राया . ज़मीं काँप उठी है आपको इस सुंदर कृति पर हार्दिक बधाई !!

    sadhana thakur के द्वारा
    March 3, 2012

    सूरज भाई ,नमस्कार ,बेहद ख़ुशी हुई ये जान की आपको रचना पसंद आई .आभार आपका ……….

    smtpushpapandey के द्वारा
    March 21, 2012

    साधना जी कृपया मेरे ब्लॉग में यह रचना भी पढ़े विवाह में जाती बंधन सामाजिक बंधन पारिवारिक बंधन अनेतिक आपकी रचना पसंद आई धन्यवाद

    sadhana thakur के द्वारा
    March 22, 2012

    जरूर पढूंगी …………

sinsera के द्वारा
March 1, 2012

साधना जी नमस्कार, सोयी हुई आत्मा को झंकृत करने वाली सुन्दर रचना..समाज में फैले अनाचार के खिलाफ आह्वान.. बधाई…

    sadhana thakur के द्वारा
    March 1, 2012

    सरिता जी .दिल से आभार आपका आपकी प्रतिक्रिया के लिए ……….

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 1, 2012

हाँ साधना जी कुछ व्यस्तता और नेट की समस्या से बस काम चला पा रहा हूँ …जरुर दर्शन करेंगे ..हमेशा लाग इन करना..फिर जागरण का कैप्चा समस्या पैदा करता है …. ख़ुद को ख़ुदा समझने वाले ये तेरी नासमझी है ……….. मत भूल तूं सिर्फ मिट्टी है तूं सिर्फ मिट्टी है ……….. बहुत सुन्दर सन्देश देती रचना गुरु जी काश लोगों की आँखें खुलें और सुधर जाएँ सब कुछ मिटटी है सब यहीं रहना है कोई खुद को खुदा न समझे मानव मानवता का पाठ पढ़े पढाये तो आनंद और आये .. सुन्दर शब्दों से सजी रचना भ्रमर ५

    sadhana thakur के द्वारा
    March 1, 2012

    भ्रमर भाई ,आपकी बहुत अच्छी प्रतिक्रिया के लिए बहुत – बहुत आभार आपका .

Kumar Gaurav के द्वारा
February 29, 2012

साधना जी प्रणाम बेहद खूबसूरत प्रस्तुति बधाई. जोश भरने का काम आपने बखूबी किया है. मेरे ब्लॉग पर जरूर आइयेगा.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 29, 2012

    गौरव जी ,बहुत -बहुत धन्यवाद् .आपकी रचना जरूर पढूंगी ……

chaatak के द्वारा
February 27, 2012

स्नेही बहन साधना जी, सादर अभिवादन, संवेदनाओं को महसूस कराती और नवसृजन का आह्वान करती इन पंक्तियों को पढ़कर रोमांचित महसूस कर रहा हूँ| अच्छे लेखन पर हार्दिक बधाई!

    sadhana thakur के द्वारा
    February 28, 2012

    चातक भी .नमस्कार .बहुत -बहुत धन्यवाद् ,आपलोगों का सहयोग हौसला देता है .दिल से आभार आपका ………

yogi sarswat के द्वारा
February 27, 2012

आह ,सीने को चीरकर एक हुँकार सी उठी है ……… इन्तहां हो चुकी अब छलक चुका है ,सब्र का पैमाना शंखनाद हो चुका है ,गद्दारों .. अब हमें है ,सच को पाना …… निश्चय ही , साधना जी प्रारंभ हो ही चूका है , वक्त के अनुसार सब कुछ बदलेगा और इन गद्दारों के चेहरे भी उतर जायेंगे ! बहुत ही ओजस्वी भाव लिए आपकी कविता को साधुवाद देता हूँ !

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    योगी जी नमस्कार ,,आपको कविता अच्छी लगी ,ये जानकर बेहद ख़ुशी हुई ,बहुत -बहुत धन्यवाद् आपका ………

chandanrai के द्वारा
February 27, 2012

सदर नमस्कार आपका कविता लेखन फलदाई पेड़ की तरह है chandanrai@jagranjunction

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    चन्दन जी ,आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार आपका …….

sukanyathakur के द्वारा
February 27, 2012

mummaa….nice poem…!! :) well written..!!

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    thanks beta ,love u …..

Rachna Varma के द्वारा
February 26, 2012

साधना जी एक बेहतरीन कविता धन्यवाद

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    रचना जी ,नमस्कार ,दिल से आभार …………

Amita Srivastava के द्वारा
February 26, 2012

साधना जी ओज से परिपूर्ण अच्छी प्रस्तुति बधाई

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    अमिता जी नमस्कार ,,बहुत -बहुत धन्यवाद् आपका…आपको रचना पसंद आई ,बेहद ख़ुशी हुई ……………

suhana के द्वारा
February 26, 2012

जोश जगाती रचना साधना जी ….

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    धन्यवाद् सुहानाजी ………

akraktale के द्वारा
February 26, 2012

साधना जी सादर नमस्कार, छलक चुका है ,सब्र का पैमाना शंखनाद हो चुका है ,गद्दारों .. अब हमें है ,सच को पाना ……. अब हमें है सच को पाना ……… सुन्दर निश्चयपूर्ण रचना. बधाई.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    अशोक जी ,बहुत -बहुत धन्यवाद् सहयोग बनाये रखने के लिए और रचना को पढने के लिए …………

Santosh Kumar के द्वारा
February 26, 2012

आदरणीय साधना बहन ,..बहुत सार्थक सन्देश देती ओजस्वी रचना !…हार्दिक साधुवाद

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    संतोष भाई ,नमस्कार आपको रचना पसंद आई ,आभार आपका ………..

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 26, 2012

साधना जी नमस्ते, राष्ट्रवाद और मानवता के नाम सन्देश से लबरेज़ आपकी यह कृति वास्तव में सराहनीय है। साभार,

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    वाहिद भाई नमस्कार ,मैं बस एक आम गृहणी हूँ ,कभी -कभी भावों को शब्दों में पिरोने की एक कोशिश करती हूँ ,ऐसे में आप सबकी थोड़ी प्रसंशा से बेहद ख़ुशी मिलती है ..दिल से आभार सहयोग और प्रसंशा के लिए ………..

vinitashukla के द्वारा
February 26, 2012

बहुत ही ओजपूर्ण और शुभ आह्वान साधना जी. बधाई आपको.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    नमस्कार विनीता जी .तहे दिल से शुक्रिया ……….

minujha के द्वारा
February 26, 2012

सच पाने का अह्वान करती आपकी ये कविता लहु में जोश जगा गई,नमन आपका और आपकी कलम का,आभार

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    मीनू ,तुम्हें कविता पसंद आई ,इसके लिए बहुत -बहुत धन्यवाद् …………

February 26, 2012

सादर नमस्कार! ख़ुद को ख़ुदा समझने वाले ये तेरी नासमझी है ……….. मत भूल तूं सिर्फ मिट्टी है तूं सिर्फ मिट्टी है …,,,,,साधना जी, इस संसार में कुछ सच ऐसे होते hai jinhe sunane ke bad खुद पर हसीं आती hai. उनमे se yah ek hai jo aapne apani इस rachana में darshaya hai,,,,koi shabd nahi jisase main इस pankti ki taarif karun. bas itna kahunga ki खुद ko manav hone पर sharm आती hai….

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    अलीन जी ,मेरी कोशिश आपको पसंद आई ,मुझे ये जानकार बेहद ख़ुशी हुई ……….

shashibhushan1959 के द्वारा
February 26, 2012

आदरणीय साधना जी, सादर ! जोश, उत्साह और आशा से परिपूर्ण आपकी यह रचना वास्तव में गद्दारों के लिए चेतावनी है. नमन ! . “राजनीति के अभिनेताओं उठो, जागो, आँखें खोलो ! जो आरोप लग रहे तुम पर, प्रत्युत्तर में कुछ बोलो !! नर्कगामियों ! कुछ तो बोलो, बच्चा-बच्चा पूछ रहा ! सबकुछ सुलभ तुम्हें ही क्यों है, वह जीवन से जूझ रहा !! शंखनाद हो चुका नई किरणें धरती पर छाई हैं ! संभलो ! संभलो ! भ्रष्ट कायरों, यह तो बस अंगडाई है !!”" . पुनः आपको और आपकी लेखनी को नमन !!!

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    शशिभूषण जी ,आप खुद इतना अच्छा लिखते हैं ,मैं तो बस एक कोशिश करती हूँ ,आपको रचना पसंद आई ,इसके लिए आपको नमन ……..

mparveen के द्वारा
February 26, 2012

साधना जी नमस्कार, सुंदर व् जोशपूरण चेतावनी …………. बहुत बहुत बधाई हो !!!! इन्तहां हो चुकी अब छलक चुका है ,सब्र का पैमाना शंखनाद हो चुका है ,गद्दारों .. अब हमें है ,सच को पाना ……. अब हमें है सच को पाना ………

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    परवीन जी ,नमस्कार ,आपको रचना पसंद आई ,दिल से आभार आपका ………

Rajesh Dubey के द्वारा
February 26, 2012

गद्दारों को चेतावनी देने वाली कविता में भाव बहुत ही सुन्दर है कि हम बदलेंगे वक्त भी बदलेगा. बहुत सुन्दर कविता.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    राजेश जी नमस्कार ,धन्यवाद सहयोग और प्रतिक्रिया के लिए ……….

nishamittal के द्वारा
February 26, 2012

साधना जी जोशीले भाव,सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    आदरणीय निशा जी ,नमस्कार .बहुत -बहुत धन्यवाद् आपका ,आपकी प्रसंशा और प्रतिक्रिया के लिए ………

alkargupta1 के द्वारा
February 26, 2012

प्रिय साधना , अति उत्तम भावाभिव्यक्ति……समय के अनुसार बदलना ही है अगर हम नहीं बदलेंगे तो समय हमें बदल देगा………अवश्य ही बदलाव होगा हम अधिक तो कुछ नहीं कर सकते हैं पर बदलाव की उम्मीद तो कर ही सकते हैं मनोयोग से सृजित काव्यकृति के लिए बधाई…..शुभकामनाएं

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    भाभी जी ,प्रणाम ,आपकी प्रतिक्रिया और प्रसंशा पाकर मैं धन्य हुई ,हमेशा आशीर्वाद बनाये रखें …….

jlsingh के द्वारा
February 26, 2012

इन्तहां हो चुकी अब छलक चुका है ,सब्र का पैमाना शंखनाद हो चुका है ,गद्दारों .. अब हमें है ,सच को पाना साधना जी, बहुत सुन्दर रचना! आभार!

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    जवाहर जी ,नमस्कार ,बहुत -बहुत धन्यवाद् ……..

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
February 25, 2012

बहुत खूबसूरत कविता.साधना जी. बदलेंगे हम ,वक़्त भी बदलेगा अँधेरे का पट खोल …. घर -घर में नई सोच जाग उठी है ………… वाकई अच्छे भाव हैं.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    राजीव जी नमस्कार .दिल से आभार आपका रचना की प्रसंशा हेतु …………..

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 25, 2012

आदरणीय महोदया , सदर अभिवादन . इन्तहां हो चुकी अब छलक चुका है ,सब्र का पैमाना शंखनाद हो चुका है ,गद्दारों .. अब हमें है ,सच को पाना … वन्दे मातरम् , बधाई सुन्दर भाव , सुन्दर प्रस्तुति.

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    सर ,नमस्कार ,बहुत -बहुत धन्यवाद् आपका ,आपकी सराहना हेतु …………

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 25, 2012

आदरणीय साधना जी, सादर प्रणाम आह आपके सिने में उठी और सीधे जा कर मेरे सिने में लग गयी है आपकी तारीफ़ करने की तो उम्र नहीं मेरी किन्तु बस इतना ही कहूँगा की यह पढ़ कर कई लोग बस ये ही कहेंगे की आह, सिने को चिर कर……….. बहुत सुन्दर रचना आपकी

    sadhana thakur के द्वारा
    February 27, 2012

    आनंद जी ,अच्छी प्रतिक्रिया के लिए आभार आपका ………..


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